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Sunday, April 1, 2012

धर्म की परभासा


धर्म की परभासा धर्म है मन मे मन की सरलता मे मन...
1 April 10:33
धर्म की परभासा
धर्म है मन मे मन की सरलता मे मन की सहजता मे मन की पबित्रता मे ,धर्मं बाहार मे नहीं स्वं के अंदर है मंदिर और शात्र धर्म नहीं धर्म के साधन है ,भगवान महवीर कहते है की धर्म को मत खोजो स्वं को खोजो तो धर्म आपने आप मिल जाऐगा धर्म तो प्रतिबिम्ब की तरह है, प्रतिबिम्ब को खोज है प्रतिबिम्ब को खोजोगे तो निरासा ही हात लगेगी ,आपने आप को पहचान लो तो प्रतिबिम्ब आपने आप काबू मे आ जाऐगा धर्म किशी व्यक्ति विशेष की जागीर नहीं कसाय मंद होगी उतना ही धर्म है ऐसा समझना उचित होगा